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कांवरियों की धमक ,हर गली हर सड़क

द्वारा- अरबिंद मिश्रा
ब्लॉग जगत के धुरंधर लिक्खाड़




सावन का महीना आया नहीं कि उत्तरांचल, उत्तर प्रदेश के साथ ही देश के कई हिस्सों की हर गली हर शहर में कांवरियों का हुजूम  उमड़ पड़ता है। चारो ओर केशरिया ताना-बाना तन उठता है। बहुत से लोगों की नज़र में यह एक अपेक्षाकृत नया हिन्दू `कल्ट´ है, एक नई सांस्कृतिक  गतिविधि है, शायद एक नया जनान्दोलन भी! पिच्छाले वर्ष  का¡वरियों और पुलिस के बीच हुई झड़पों में कई का¡वरियों की दर्दनाक मौतें हो चुकी हैं, कई तो सड़क दुर्घटनाओं  की भेंट चढ़ गये हैं. इनमें कई ऐसे मासूम किशोर हैं जिन्होंने अभी जीवन का ककहरा भी नहीं पढ़ा था- और न ही वे समाज के लिए कोई योगदान ही कर सके थे- पितृ, मातृ या गुरु ऋण की तो बात ही दीगर है - हो सकता है वे समाज के होनहार सपूत साबित होते किन्तु असमय ही एक परिहार्य हादसे/उन्माद के शिकार हो गये।
आखिर यह का¡वरिया प्रसंग है क्या? क्या ये हिन्दू मानस/जीवन दर्शन की एक नई अभिव्यक्ति है? कोई नया सांस्कृतिक आन्दोलन? अपने मौजूदा रुप में का¡वरियों के अवतरण की कहानी बमुश्किल एक दशक पुरानी है, अभी चन्द वर्षों पहले तक इक्का-दुक्का केशरिया वेशधारी `बोल बम´ का उदघोष करते सड़कों पर दिख जाते थे और हमारी मिली-जुली संस्कृति की एक कौतूहल भरी, सुखद झलक प्रदर्शित कर जाते थे-किन्तु अब तो उनका पूरा हुजूम ही सड़कों पर उतर आया है- इन गेरुआधारियों ने बसों, रेलों तक में कब्जा जमा लिया है, इनके लिए सड़क की `लेन´ तक रिजर्व कर दी जा रही है- लोग वह वाकया नहीं भूले होंगे जब एक सनकी का¡वरिये ने बनारस और इलाहाबाद के बीच रेलगाड़ी उल्टे ही सरपट दौड़ा दी थी और हालीवुड के हादसा कथानकों को भी मात करते हुए महज पैंतालीस मिनट के रिकार्ड टाइम में वह दूरी तय कर ली थी, जिन्हें रेले अमूमन तीन, साढ़े तीन घण्टे में पूरी करती हैं- गनीमत रही कि ट्रेन खाली थी और रेल प्रशासन की सूझबूझ से एक बड़ा हादसा टल गया था। दरअसल वही घटना का¡वरियों के आगमन का तुमुल घोष था, शंखनाथ था ……
कभी उत्तरांचल के पहाड़ी निर्गम स्थलों के पुजारी-पण्डे जाड़े की भीषण ठंड और ठाले के सीजन में जीविकोपार्जन के लिए कुछ भोजपत्र, गंगोत्री का कथित पवित्र (गंगा), जल, ऊनी कम्बल आदि लेकर दक्षिण के अपने जजमानों के यहा¡ पहु¡चते थे, उन्हें `कामारथी´ कहा जाता था वे आज भी आते हैं पर अब `इक्का दुक्का हो चले हैं, नये का¡वरिये शिव भक्तों ने उन्हें अब विस्थापित सा कर दिया है- सम्भवत: कामारथी शब्द की ही एक नई व्युत्पत्ति अब का¡वरिया हो गयी है, जो बोल चाल और पत्रकारिता की के लिए भी एक मुफीद शब्द है- कामारथी भी शिव भक्त थे और ये `का¡वरिये´ भी शिव के गण हैं। कहते हैं गुलशन कुमार के `टी सीरीज´ के शिव भक्ति के गानों और वैष्णव देवी के दर्शन पूजन को जाते समूहों की शूटिंग (जिसमें प्राय: गुलशन कपूर भी आपाद मस्तक गेरुये वस्त्रों में दिखाये जाते थे) के टी0वी0 फुटेज ने इस नये का¡वरिया¡ कल्ट´ को हवा दी है।
का¡वरियों के चलते कई व्यापारिक गतिविधियों को बढ़ावा मिला है। वैसे भी, धार्मिक रीति रिवाजों और इनसे जुड़े व्यावसायिक हित साधकों के बीच एक छुपा हुआ सम्बन्ध रहा है, भारतीय लोकमानस में धार्मिक क्रिया-कलाप प्राय: एक समूह-गतिविधि बन जाते हैं अत: चतुर व्यवसायियों की नजर इन पर रहती है, धार्मिक अनुष्ठानों-कर्मकाण्डों में इस्तेमाल हो रही सामगि्रयों पर जरा गौर करें- धूप, दीप नैवेद्य से लेकर अनेक छोटे बड़े आइटम व्यावसायिक हितों का ही तो पोषण कर रहे हैं- का¡वरियों की वेष-भूषा देखें, उनके वस्त्र, `का¡वर´ और उस पर लटकती रंग बिरंगी सामगि्रया¡! बाजार में यह सारी साज-सज्जा दो तीन सौ से एक डेढ़ हजार रुपये के बीच बिक रही है, जिनकी रोजमर्रा के खर्चों  को उठाने की क्षमता नहीं है वे भी उधार बाढी लेकर स्वयं या परिजनों के लिए एक अदद का¡वर की जुगाड़ जरुर कर ले रहे हैं- एक नया व्यवसाय फलफूल रहा है- `का¡वर´ बेचने वालों की चा¡दी हो गयी है। लिहाजा वे भी का¡वरियों के पक्ष में एकजुट हो गये हैं, उन्हें अपने व्यवसाय की फिक्र है। शहर से गा¡व कस्बों तक फैले ऐसे छोटे बड़े व्यवसायी का¡वरियों के हित साधन में जुटे हैं, उनके पक्ष में लामबन्द हैं और उनके विरुद्ध कुछ भी सुनना नहीं चाहते। बल्कि का¡वरियों के आक्रोश प्रदर्शन में वे इनका खुले या छुपे साथ भी दे रहे हैं।
भारतीय जीवन दर्शन जो तमाम धार्मिक दार्शनिक तथा लौकिक विचारधाराओं से  पोषित होता रहा है की एक प्रबल मान्यता यह भी है कि मानव को जीवन के अन्तिम प्रहर (चौथेपन) में धार्मिक कार्यों  और अनुष्ठानों को तरजीह देनी, चाहिए। जीवन के उत्तरार्ध को धरम करम के लिए समर्पित करना चाहिए। वानप्रस्थ या सन्यास ले लेना चाहिए। किन्तु का¡वरियों में इस मान्यता के ठीक उलट बच्चों और किशोरों में गेरुआ धारण की प्रवृत्ति उभर रही है। इस नये मनोविज्ञान को समझना होगा।
क्या बच्चों, किशोरों और युवाओं को गेरुआ धारण करने के लिए उनकी दिशाहीनता, बढ़ती बेरोजगारी और अपनी अिस्मता/पहचान खोते जाने की स्थितिया¡ तो जिम्मेदार नहीं हैं? आखिर, काम काज के अभाव और किसी जातीय या राष्ट्रीय संकल्प के कमी से दिगभ्रमित युवा कहा¡ जाय, क्या करें? ऐसे में अलप काल के लिए ही सही का¡वरिये की वेषभूषा और इस नई पहचान तथा `समूह भावना´ से उनमें कुछ कर गुजरने का जज्बा जोर मारता है, और समाज में अपनी एक विशिष्ट छाप छोड़ने को वे उद्यत हो उठते हैं। उन्हें अपने आगे सब कुछ बौना दिखता है- तुच्छ और चुटकियों में मसल देने के लायक, चाहे वह कोई प्रशासनिक व्यवस्था हो या कोई और प्रतिबन्ध। समाज के कई अन्य चििन्हत समूहों, सैनिक, सिपाही, चिकित्सक, वकील, शिक्षक छात्र के क्रम में ही अब काँवरिया  भी एक पावरफुल सामूहिक संज्ञा बन चुका है- “जो हमसे टकरायेगा चूर-चूर हो जायेगा´´ की प्रचलित समूह भावना इनमें भी हिलोरे ले रही है। लोगों को अब सावधान हो जाना चाहिए जो गफलत में रहा, धोखा खायेगा।
मानव व्यवहार शास्त्रियों की माने तो मनुष्य की विकास गाथा में उनकी घुमन्तू टोलियों की एक बड़ी भूमिका रही है- समूचे विश्व में हमारे आदि पुरखों की बर्बर घूमन्तू टोलियों ने काफी आतंक मचाया है- इतिहास के कई काले धब्बे उनकी कारगुजारियों की देन है। यहाँ  इतिहास के पन्नों पर नजर फिराने का मकसद नहीं है, महज यह बताना है कि `घूमन्तू टोलियों´ की समूह मानसिकता हमेशा एक ही सी रही है- अभी हमारे `जीन´ नहीं बदले हैं- समूह मानसिकता दरअसल शिकार (करने) की मानसिकता होती है, विजयी होने की मानसिकता होती है, हिंसा और आक्रामकता की मानसिकता होती है- `माब साइकालॉजी´ के साथ इसलिए काफी सतर्कता से पेश आना होगा।
समाज में प्रतिगामी और साम्प्रदायिक सोच वाले लोगों की कमी नहीं है जो काँवरिया में अपने आधे-अधूरे कार्यों , निहितारथों  को पूरा करने का स्वप्न संजो रहे हैं- उन्हें वे हिन्दू जागरण की एक नई किरण के रुप में देख रहे हैं। कांवरियों और अन्य धर्म-सम्प्रदायों में टकरावों की आशंकाओं को भी दर किनार न करके गम्भीरता से देखना होगा और सजग रहना होगा। जरा सी भी असावधानी या चूक एक बड़ी शर्मनाक घटना में बदल सकती है।
का¡वरिये राष्ट्रीय सम्पत्ति को आग के हवाले करने में तनिक भी हिचक नहीं रहे हैं- वरदीवालों पर उनका गुस्सा ज्यादा ही फट पड़ रहा है जो शायद एक तरह के `रिडाइरेक्टेड एग्रेसन´ का परिणाम है और समाज की वर्दीधारियों  के प्रति सामूहिक सोच का इजहार है। माध्यम कांवरिये बने हैं .यहाँ  भी अतिरिक्त सतर्कता की अपेक्षा है।
इधर नवधनाढ़्यों की एक नई फौज भी इन कांवरियों में घुसपैठ कर रही है, जिनमें महिलायें  भी हैं। मौज मस्ती के लिए किसी भी नये गेम की तलाश में रहने वाले इन युवक युवतियों को कांवरियों का भेष भा गया है- वे भी अपनी कुंठित कामनाओं और अभिजात्य प्रदर्शन के लिए कांवरियों की कतार में शामिल हो गये हैं। इनकी ए0सी0 बसें भी कान्वारिओं के लिए सुरक्षित लेनों में आ पहुँची   हैं। इनसे भला हिन्दू धर्म का क्या भला होने वाला है?
कुल मिलाकर देखें तो कांवरिये नागरिक प्रशासन के लिए एक बड़ी चुनौती बन गये हैं। अब बिना समय गवाए  इस बढ़ती `समस्या´ से निरापद रुप से निपटने की गम्भीर कवायद शुरू करनी है- यदि दूसरी कई सामाजिक समस्याओं की तरह ही इसका भी कोई सामाजिक हल ढूढ़ने की शुतुरमुर्गी नीति अपनायी गयी तो एक लम्बा समय इसमें व्यतीत हो जायेगा, जबकि अब हमारे पास अब इस `गेरुई´ क्रान्ति को अनदेखा करने का कत्तई वक्त नहीं है।


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5 Responses to “ कांवरियों की धमक ,हर गली हर सड़क ”

  1. समाज में प्रतिगामी और साम्प्रदायिक सोच वाले लोगों की कमी नहीं है जो काँवरिया में अपने आधे-अधूरे कार्यों , निहितारथों को पूरा करने का स्वप्न संजो रहे हैं- उन्हें वे हिन्दू जागरण की एक नई किरण के रुप में देख रहे हैं। कांवरियों और अन्य धर्म-सम्प्रदायों में टकरावों की आशंकाओं को भी दर किनार न करके गम्भीरता से देखना होगा और सजग रहना होगा। जरा सी भी असावधानी या चूक एक बड़ी शर्मनाक घटना में बदल सकती है।

    बहुत ही सही कहा अरविन्द भाई आपने….

  2. बधाई …अच्छा लिखा है. आज धर्म की आड़ में सभी अपना -अपना सिक्का जमा रहे हैं. ई-भोजपुरिया.कॉम को भी बधाई

  3. Good provoked thought… keep it up…thanks for such a nice post.

  4. कांवरियों और अन्य धर्म-सम्प्रदायों में टकरावों की आशंकाओं को भी दर किनार न करके गम्भीरता से देखना होगा और सजग रहना होगा। जरा सी भी असावधानी या चूक एक बड़ी शर्मनाक घटना में बदल सकती है।

    ye baat bilkul sach hai..hame iske liye sazag rahana hoga…

    Amit Tyagi
    Manager-Consumer Banking
    HDFC Bank, Gurgaon, Haryana

  5. Hi, very nice post. I have been wonder’n bout this issue,so thanks for posting

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